लखीमपुर खीरी में धान खरीद का दावा फेल! पोर्टल बंद, क्रय केंद्रों पर सन्नाटा, औने-पौने दाम पर धान बेचने को मजबूर किसान
15 अक्टूबर से खरीद शुरू होने का दावा, लेकिन 25 अक्टूबर तक जमीनी हकीकत कुछ और; पलिया मंडी के 12 क्रय केंद्रों में सिर्फ एक पर खरीद होने का आरोप

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लखीमपुर खीरी/पलिया कलां। किसानों की आय बढ़ाने और उनकी फसल का उचित मूल्य दिलाने के सरकारी दावों के बीच लखीमपुर खीरी में धान खरीद व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। जिले में धान खरीद की शुरुआत 15 अक्टूबर से किए जाने की बात कही गई, लेकिन 25 अक्टूबर तक भी अनेक किसान अपनी फसल बेचने के लिए परेशान हैं। कहीं किसान पंजीकरण का पोर्टल नहीं खुल रहा, तो कहीं सरकारी क्रय केंद्रों पर खरीद की रफ्तार बेहद धीमी होने की शिकायतें सामने आ रही हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि जब किसान का पंजीकरण ही नहीं हो पा रहा, तो वह अपनी उपज सरकारी केंद्रों पर कैसे बेचे?
12 केंद्र स्थापित, खरीद सिर्फ एक पर होने का दावा
पलिया कृषि मंडी में जब एनए न्यूज की टीम पहुंची, तो वहां किसान अपना धान सुखाते नजर आए। लेकिन किसानों के मुताबिक, मंडी समिति में स्थापित 12 धान क्रय केंद्रों में से केवल एक केंद्र पर ही खरीद होती दिखाई दी। बाकी केंद्रों पर खरीद की स्थिति को लेकर किसानों में नाराजगी है।
किसानों का कहना है कि सरकार ने धान खरीद की तारीख तो घोषित कर दी, लेकिन जमीनी स्तर पर ऐसी व्यवस्था नहीं बन पाई, जिससे वे समय पर अपनी फसल बेच सकें। पंजीकरण पोर्टल की समस्या ने उनकी मुश्किलें और बढ़ा दी हैं। किसान अपनी उपज लेकर तैयार हैं, लेकिन सरकारी खरीद प्रक्रिया में आगे बढ़ने का रास्ता ही नहीं मिल रहा।
सरकारी खरीद का इंतजार, मजबूरी में कम दाम पर बिक्री
धान की सरकारी खरीद में देरी का सीधा असर किसानों की जेब पर पड़ रहा है। किसानों के अनुसार, सरकारी केंद्रों पर फसल बेचने की प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाने के कारण उन्हें मजबूरी में अपनी उपज खुले बाजार में कम कीमत पर बेचनी पड़ रही है। उनका आरोप है कि जहां उन्हें धान के लिए 1,400 से 1,600 रुपये प्रति क्विंटल तक के भाव मिल रहे हैं, वहीं सरकारी खरीद व्यवस्था में बिचौलियों की भूमिका को लेकर भी गंभीर सवाल हैं।
किसानों ने आरोप लगाया कि कुछ बिचौलियों के माध्यम से धान खरीद कर बाद में उसे सरकारी केंद्रों पर तौल कराए जाने की आशंका है। उनका दावा है कि इस प्रक्रिया में खरीद के आंकड़ों और किसानों को मिलने वाले वास्तविक लाभ के बीच बड़ा अंतर हो सकता है। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र जांच और संबंधित अधिकारियों का पक्ष सामने आना जरूरी है।
केंद्रों पर धान नहीं, फिर कागजों में खरीद कैसे?
धान खरीद व्यवस्था को लेकर सबसे गंभीर सवाल सरकारी अभिलेखों में दर्ज खरीद के आंकड़ों पर उठ रहे हैं। किसानों का आरोप है कि आने वाले समय में जब क्रय केंद्रों पर धान की आवक दिखाई नहीं देने के बावजूद कागजों में खरीद दर्ज कर दी जाएगी। उनका दावा है कि प्रतिदिन हजारों क्विंटल खरीद दिखाए जाने और वास्तविक स्थिति के बीच अंतर की जांच होनी चाहिए।
यदि केंद्रों पर खरीद की मात्रा, किसानों के पंजीकरण, धान की आवक, तौल और भुगतान के रिकॉर्ड का मिलान कराया जाए, तो स्थिति स्पष्ट हो सकती है। ऐसे में जिला प्रशासन और संबंधित खरीद एजेंसियों की जिम्मेदारी है कि वे वास्तविक खरीद के आंकड़े सार्वजनिक करें और किसानों की शिकायतों का जवाब दें।
बाढ़ की मार के बाद अब धान खरीद की परेशानी
लखीमपुर खीरी के किसानों की मुश्किलें केवल धान खरीद तक सीमित नहीं हैं। बाढ़ से प्रभावित किसानों के लिए फसल बचाना पहले ही बड़ी चुनौती रहा है। अब जब फसल बेचने का समय आया है, तो पंजीकरण और खरीद प्रक्रिया में आ रही दिक्कतों ने उनकी आर्थिक परेशानी बढ़ा दी है।
किसानों का कहना है कि खेती में खाद, बीज, सिंचाई, मजदूरी और अन्य संसाधनों पर खर्च करने के बाद जब उपज बेचने की बारी आती है, तब उन्हें उचित मूल्य नहीं मिल पाता। सरकारी खरीद व्यवस्था का लाभ समय पर नहीं मिलने से उनकी लागत निकालना भी मुश्किल हो जाता है।
सरकार की मंशा और जमीनी व्यवस्था के बीच सवाल
सरकार किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य दिलाने और बिचौलियों से बचाने के लिए सरकारी खरीद व्यवस्था संचालित करती है। लेकिन यदि किसान पंजीकरण नहीं करा पा रहे हैं, क्रय केंद्रों पर खरीद नहीं हो रही है और उन्हें मजबूरी में कम दाम पर धान बेचना पड़ रहा है, तो इस व्यवस्था की प्रभावशीलता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब 15 अक्टूबर से खरीद शुरू होने की घोषणा की गई थी, तो 25 अक्टूबर तक किसानों को किन समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है? पलिया मंडी के सभी 12 क्रय केंद्रों पर वास्तविक खरीद कितनी हुई? कितने किसानों का पंजीकरण पूरा हुआ? कितनी उपज खरीदी गई और कितने किसानों को भुगतान मिला? इन सवालों के जवाब सार्वजनिक होने चाहिए।
प्रशासन से उठ रहे हैं ये सवाल
पंजीकरण पोर्टल की समस्या दूर करने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं?
पलिया मंडी समिति के सभी 12 क्रय केंद्रों पर खरीद की वास्तविक स्थिति क्या है?
सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज खरीद और केंद्रों पर पहुंची उपज का मिलान कब कराया जाएगा?
बिचौलियों के माध्यम से खरीद और रिकॉर्ड में गड़बड़ी के आरोपों की जांच कौन करेगा?
कम कीमत पर धान बेचने को मजबूर किसानों को राहत देने के लिए प्रशासन क्या कार्रवाई करेगा?
फिलहाल, धान खरीद की व्यवस्था को लेकर किसानों की परेशानी और उनके आरोप कई गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं। जरूरत है कि जिला प्रशासन केवल कागजी आंकड़ों पर भरोसा करने के बजाय क्रय केंद्रों का स्थलीय निरीक्षण करे, पंजीकरण संबंधी समस्याओं को दूर कराए और वास्तविक खरीद की पारदर्शी जानकारी सार्वजनिक करे। किसानों को आश्वासन नहीं, अपनी उपज बेचने का अवसर और उसका उचित मूल्य चाहिए। अब देखना यह है कि जिम्मेदार अधिकारी इन शिकायतों पर कार्रवाई करते हैं या धान खरीद की परेशानी के बीच किसान यूं ही अपनी मेहनत की फसल औने-पौने दामों पर बेचने को मजबूर रहते हैं।



